जब स्कूल खुले ही नहीं तो पूरी फीस कैसी, कम से कम 15 फीसदी फीस कम करें संस्थान : सुप्रीम कोर्ट

New Delhi : सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुये आज कहा कि अगर एजुकेशनल इंस्टीच्यूशन लॉकडाउन की वजह से खुले ही नहीं तो पूरी फीस कैसे ले सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने एक न्यूनतम कटौती दर भी निर्धारित कर दी। कोर्ट ने कहा कि कम से कम 15 फीसदी कटौती फीस में करना ही होगा। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से देश के अभिभावकों को लॉकडाउन की वजह से बड़ी राहत मिलेगी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि सभी छात्रों को अपना बकाया चुकाने के लिये इस साल अगस्त माह तक का समय दिया जाये। इस दौरान छात्र किस्तों में अपने बकाया फीस का भुगतान कर सकते हैं। इसके बाद भी अगर कोई छात्र अपना फीस अगस्त तक नहीं अदा कर पाता है तो उसको एग्जाम देने से और रिजल्ट हासिल करने से नहीं रोका जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एएम खनविल्कर और दिनेश महेश्वरी की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के बाद आदेश जारी करते हुये कहा कि चूंकि एजुकेशनल इंस्टीच्यूशन्स ने ऑनलाइन पढ़ाई कराई है और पढ़ाई के दूसरे टूल्स दिये हैं इसलिये शैक्षणिक सत्र 2020-21 की फीस ले सकती है लेकिन जब स्कूल सालभर लॉकडाउन की वजह से खुले ही नहीं तो पूरा फीस कैसे ले सकते हैं। इसमें रियायत दी जानी चाहिये। सुप्रीम कोर्ट में यह मामला राजस्थान सरकार के एक फैसले के बाद आया था, जिसमें राजस्थान सरकार ने एजुकेशनल इंस्टीच्यूशन्स को अपनी फीस में तीस फीसदी की कटौती करने का आदेश दिया था। राजस्थान सरकार ने अपने इस आदेश में आपदा प्रबंधन एक्ट 2005 का हवाला दिया था। इस आदेश के खिलाफ एजुकेशनल इंस्टीच्यूशन्स सुप्रीम कोर्ट चले गये थे।
अभिभावकों को सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले काफी राहत मिलेगी। खासकर वैसे लोगों को जो लॉकडाउन की वजह से आर्थिक तंगी और परेशानियों से गुजर रहे हैं। देश में अन्यान्य जगहों पर अभिभावक संघ फीस में रियायत देने की मांग कर रहा है लेकिन राज्य सरकारों से कोई राहत नहीं मिल रही। वैसे कई नये एजुकेशनल इंस्टीच्यूशन पहले ही फीस कम कर चुके हैं लेकिन पुराने संस्थान फूटी कौड़ी भी कम करने को तैयार नहीं हैं।

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