जानें कौन करेगा प्रियंका का कन्यादान,करोड़ों की लागत से इस तरह तैयार हुआ था दुनिया का अंतिम महल

New Delhi: बॉलीवुड की देसी गर्ल प्रियंका चोपड़ा अपने विदेशी मंगेतर से शादी के बंधन में बंधने जा रही हैं। शादी के लिए निक के परिवार वाले भी भारत आ चुके हैं। दोनों के परिवार वाले जोधपुर पहुंच चुके हैं। दोनों 2 दिसंबर को शादी के बंधन में बंध जाएंगे। ये बॉलीवु़ड की सबसे शाही शादी मानी जा रही हैं। 2 दिसंबर को ये शादी शाही अंदाज में जोधपुर के ‘उम्मेद भवन पैलेस’ में होगी। जिसके लिए अगले 5 दिनों तक पूरे पैलेस को बुक कर लिया गया है। खबर है कि प्रियंका का कन्यादान उनके अंकल यानि परिणीति चोपड़ा के माता-पिता करेंगे। गौरतलब है कि मारवाड़ के शाही परिवार का यह निवास दुनिया में सबसे बड़ा निजी आवासीय परिसर है। अब इसका एक हिस्सा होटल में बदला जा चुका है। इसके निर्माण के लिए बर्मा से लकड़ी आई थी। वहीं पत्थर लाने के लिए रेल लाइन बिछाई गई थी।

इस महल का मारवाड़ और अकाल का सदियों पुराना नाता रहा है। तीन बरस अकाल के पश्चात यहां एक बरस सुकाल रहता था। बहुत कम बारिश होने के कारण मारवाड़ के लोग रोजगार की तलाश में यहां से पलायन कर जाते थे। ऐसे में तीस के दशक में पड़े भीषण अकाल के दौरान तत्कालीन महाराजा उम्मेद सिंह ने लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए उम्मेद भवन का निर्माण शुरू कराया। चौदह बरस तक चले इस निर्माण पर तीन हजार लोगों को प्रत्यक्ष व हजारों लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला।

विश्व के बेहतरीन होटल का खिताब हासिल कर चुके उम्मेद भवन के निर्माण पर उस समय महज डेढ़ करोड़ की लागत आई। अब अनमोल माने जाने वाले उम्मेद भवन की कम लागत के पीछे मुख्य कारण यह रहा कि इसमें कुछेक चीजों को छोड़ अधिकांश स्थानीय सामग्री काम में ली गई। स्थानीय सामग्री पर शाही परिवार का हक होता था। ऐसे में उन्हें इसके लिए अलग से कुछ भुगतान नहीं करना पड़ा।

इस पैलेस के निर्माण में जोधपुर के छीतर पत्थर का उपयोग किया गया। इसके लिए महाराजा ने सूरसागर के निकट फिदुसर में विशेष खान से पत्थर निकालना तय किया। इस खान को आज भी राज खान के नाम से जाना जाता है। पत्थर का परिवहन करने को उन दिनों इतने साधन नहीं थे। ऐसे में फिदुसर से प्रस्तावित महल के निर्माण स्थल तक बारह मील लम्बी मीटर गेज लाइन बिछाई गई। पत्थर परिवहन के लिए विशेष प्रकार के डिब्बों का निर्माण किया गया। इस मार्ग से रोजाना एक रेलगाड़ी पूरी तरह से प्रस्तर खंडों से लदकर निर्माण स्थल पर पहुंचती।

उम्मेद भवन के निर्माण में लकड़ी के काम के लिए बर्मा टीक काम में ली गई। इसके लिए विशेष रूप से बर्मा(म्यांमार) से लकड़ी मंगाई गई। इसके लिए बड़ी संख्या में कारीगरों ने वर्षों तक इसके खिड़की व दरवाजों का निर्माण किया। इसके लिए बीस हजार घनफीट लकड़ी काम में ली गई। उस समय इसकी लागत महज साठ हजार रुपए ही आई। वर्तमान दौर में यह राशि करोड़ों में है। भव्य उम्मेद भवन को रोशन करने के लिए अलग-अलग आकार के दस लाख मीटर लम्बाई के तार बिछाए हुए है। उस समय इसे रोशन करने को ढाई हजार किलोवाट बिजली की आवश्यकता होती थी। जबकि वर्ष 1943 में पूरे जोधपुर की बिजली की खपत इसकी एक तिहाई ही थी।

उम्मेद भवन का उद्घाटन महाराजा उम्मेद सिंह के बेटे और वर्तमान में पूर्व नरेश गजसिंह के पिता हनवंत सिंह के विवाह पर 13 फरवरी 1943 को किया गया। महाराजा के छोटे बेटे सात साल के दिलीप सिंह ने इसके मुख्य द्वार पर लगे सोने के ताले को खोल इसका विधिवत उद्घाटन किया।

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